Tuesday, January 26, 2010

केशिनी तेरे केशू "

केशिनी तेरे केशू "

बंध केशुओ में रमा रसिक सौन्दर्य
उस दिन-
जब हुए बंध-हीन |
एक टक सी आखें रह गयी देखती,
दृश्य उस पल-
फिर जो कभी न हुआ ओझल |

मधुरिमा का लगा ऐसा दुर्जर,
जैसे कोई अचम्भा -
स्वर्ग से आई हो कोई रम्भा |
मुस्कान से रोशन हसीं चेहरे पर ,
लग गए चार चाँद-
हुए बंध केशू जब, लाल पट्ट से आजाद |

केशिनी के मुख पर केशू लहराए ,
जैसे केशर संजोए मधुरानन |
उसपर मधुकरी मडाराए ,
सौम्य मुख का सुख पावन |

उलझे केशपाशों का लेकर बहाना ,
यूँ मर्म हथेलियों ने-
पूरे किये स्पर्स के सपने |
कुछ पे उंगलियाँ फिर ,
कुछ को कानो के पिच्छू दबा ,
बन बैठे हैं दुश्मन-
तेरी हथेलियाँ -
हमारे मन ही मन |

पर हम भी रोक न पाए ,
अपने अरमां |
"बहुत अच्छे लग रहे हो "
की दे डाली उपमा |
और यूँ पूरा किया अपना सपना |
देकर भावनाओं को अपनी जुबाँ |

एक अनोखी अनबुझी पहेली
बनकर
ढा गया मुझपर ,
केशिनी तेरा केशविन्यास |
बनकर एक एहसास ,
मुझमे समां गयी तू |
जब हुए थे बंध-हीन ,
हाँ उसी दिन ,
केशिनी तेरे-
केशू |

No comments:

Post a Comment