Saturday, August 21, 2010

दिल बोले इंतज़ार कर

थक गए तुम्हारी राह तकते-तकते
मंजर का अब तक नामों-निशाँ नहीं
बर गए तेरी याद में जलते-जलते
आगे निकल गए तुम, हम रह गए पीछे कहीं
बैठें हैं ताक में, झरिया के झाग पर-
औ' दिल बोले- अब भी इंतज़ार कर ||

काटने को दौड़ें ये खामोश दीवारें
बड़ा चुभाए ये आलम-ए-तन्हाई
सूख गयी आँखें नित बहा अस्कों की धारें
गूंगा रहा मालिक, ना हुआ दरबार-ए-खुदा सुनवाई
थक गयी है रूह सितम-ए-इश्क बर्दाश्त कर
औ' दिल बोले- अब भी इंतज़ार कर ||

थक गए हम कोटि मन्नतें मांग-मांग
सुनता रहा वो मालिक बहरा
थक गए हम ज़ालिम समय की पीड़ा लांघ लांघ
न छंट रहे ये काले बादल न छना ये कोहरा
न जाने कैसे रहे तुम खुस हमें बर्बाद कर
औ' दिल बोले- अब भी इंतज़ार कर ||

आओ देखो हम वहीँ जहाँ
तुम छोड़ गए जिस मुकाम पर
क्यों ले रहे बताओ मेरे सब्र का इंतहान
क्या आओगे अब मेरी मय्यत की खबर जानकर ?
टूट गए हैं हम अपने जिस्म-ओ-जान से
औ' दिल बोले- अब भी इंतज़ार कर ||

बस आ जाओ अब और नहीं
अब और न तडपाओ मेरी जान
तेरे बिन तो मैं हूँ ही नहीं
तुम मेरे खुदा, मेरा सर्वस्व तेरे नाम
नहीं  हो सकता कोई इन्सां इतना पत्थर
आ जाओ बस - अब आ जाओ खुदा के नाम पर
 क्योंकि दिल बोल रहा बस अब मत इंतज़ार कर ||

  

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