Wednesday, October 6, 2010

जब तू मुझसे मिलने चली आती है. . .

सूरज की वो पहली किरण बनकर
खिड़की से झाँक मुझको जगाती है|
सुबह की ताज़ी हवा में समाई
वो रोज़ मुझसे मिलने चली आती है |
सुकून की हवा में बिगड़े बाल सँवारकर
हौले से मुझे सहलाती है |
कभी तेज़ झोंकों में आ -
मुझसे यूँही लड़ती-झगड़ती है |
चिड़ियों की धुन में प्यार भरकर
वो मीठा प्रेम गीत सुना जाती है |
सुहाने मौसम में बारिश की बूंदे बनकर
लिपट मुझसे वो रोया करती है |
पत्तों से छींटें मार तो कभी ओले बरसाकर
वो मुझसे फिर खेला करती है |
सतरंगी इन्द्रधनुष बनकर -
फिर 'कैसी लग रही हूँ मैं' वो मुझसे पूछा करती है |
कभी मोरनी की पंकों में -
मोहिनी वो मेरा मन मोह ले जाती है |
मेघ-गर्जना की मस्ती में वो
नित नृत्य संग मेरे कर जाती है |
कभी धुप बन मुझे सताती है'
कभी शाम बन मुझे मनाती है |
चांदनी रातों में श्रृंगार कर, दूर से मुझे निहारती है
बहकता है दिल औ' पास उसे मैं बुलाता हूँ |
शर्माकर वो भोली, बादलों में जा छुप जाती है |
उसे देखने के इंतज़ार में मेरी आँखें लग जाती हैं,
औ' मिलने उसे सपनों में खो जाता हूँ |
फिर चुपके से वो बादलों से बाहर आकर -
रात भर मुझे निहारा करती है |
सच है प्रियसी -
बड़ा अच्छा लगता है जाने-अनजाने में,
जब तू मुझसे मिलने चली आती है ||

1 comment:

  1. true love doesn't need any physical presence of your lover, its just a cute feeling like this.

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